Description
शहर एक शरीर‘ है की ये कविताएँ हर नागरिक को प्रिय हो उठेंगी। कारण यही कि इनकी महीन सुंदर बुनावट में उसके अपने अनुभव भी शामिल होने की इच्छा करने लगेंगे । …. निश्चय ही ये कविताएँ उनके सोच–विचार के साथ पकती रही हैं। ये सच्ची , जमीनी , धूल माटी से बने वास्तुशिल्प जैसी भी हैं , जो पुख्ता होता है , औरअपनेवास्तुशिल्पमेंआकाशकेलिएजगहबनाताहै।
−प्रयाग शुक्ल
कुछ खोने का भय न हो और कुछ पाने की महत्वाकांक्षा मिट जाय तो मृत्यु से दोस्ती संभव है। रवीन्द्र जी ने यह दोस्ती हासिल कर ली है।… अपनी कविताओं में बार– बार इस दोस्त को याद करते हैं। ‘ठमठमाते‘ हुए जैसे उसके हाथ में हाथ डाले चल रहे हों। ऐसी आवाजें मैंने संत कवियों के यहां सुनी है। यह एक मनस्थिति है, जिसके लिए संत होना नहीं, साहस होना जरूरी है। यह निर्भीकता रवीन्द्र जी के व्यक्तित्व में पहले से थी लेकिन अब वह परम निर्भीकता में बदल गयी है। यहीं खड़े होकर वे कविताएँ लिख रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में उनकी रचनाओं को देखना होगा। वे मीर तकी मीर को उद्धृत करते हैं, ‘अपनी ही सैर करने हम जलवागर हुए थे।‘ इसे रवीन्द्र जी के संदर्भ में इस तरह कहना अर्थपूर्ण होगा कि ‘अपनी ही सैर करने हम जलवागर हुए हैं
−सुभाष राय
तमाम तरह की उत्सवधर्मिता और साहित्य जगत की तीन–तिकड़मों से एकदम अलग
रहते हुए रवीन्द्र वर्मा पिछले छ: दशकों से लगातार लिख रहे हैं…
रवीन्द्र वर्मा के कविता–संसार का वर्णक्रम बहुत व्यापक है। सहज प्रवाहमयता के साथ वह अपने समय और समाज के यथार्थ के लगभग हर पहलू को समेटते हैं और उनके पर्यवेक्षण जितने दूरबीनी होते हैं उतने ही
ख़ुर्दबीनी भी होते हैं। निरलंकृत भाषा, सादगी और आत्मीयता के साथ संवाद करती सहजबयानी ही उनकी कविताओं का सौन्दर्य और उनकी ताक़त है। …
एक ओर ये कविताएँ जीवन के राग–विराग की,नेह–बिछोह की, लगाव–अलगाव की, स्मृति–विस्मृति की कविताएँ हैं, दूसरीओर, इनमें कहीं व्यतीत का आलोचनात्मक सिंहावलोकन है, कहीं दुनिया छोड़ चुके दोस्तों की यादे हैं, कहीं जीवन का मर्म तलाशती दार्शनिक उदासी है, तो कहीं अपने समय की सामाजिक–सांस्कृतिक आपदाओं और राजनीतिक छल–नियोजनों
पर चिन्तातुर बौद्धिक विमर्श है। इनमें कहीं आत्मवृतान्त आते भी हैं तो वे बन्द कमरे की कथा नहीं कहते। उनकी यादों की कोठरी के झरोखे सड़कों–गलियों की ओर खुले रहते हैं। इन विविधवर्णी कविताओं के बीच आपको
नवउदारवादी आपाधापी का शोर और फासिस्ट बूटों की धमक भी बीच–बीच में
सुनाई और फिलिस्तीन, उक्रेन से लेकर मणिपुर तक की विभिषिकाओं की छायाएँ
देखने को मिलती रहेंगी।
…रवीन्द्र वर्मा की कविताओं में ऊर्जस्विता के आवेग के साथ ही बौद्धिक विमर्श और ऐतिहासिक चिन्ताओं का गुरुत्व लगातार मौजूद रहता है और फिर भी ये कविताएँ किसी दोस्त के साथ सहज आत्मीय संवाद जैसी महसूस होती है।
−कात्यायनी
उनकी कविताएँ जलप्रपात जैसी सचल, उज्ज्वल और शोर मचाती नहीं होतीं, जहाँ पर्यटक पिकनिक मनाने जाएँ। वे किसी शांत झील के भीतर सहसा उठे उस हलके जल–वृत्त की तरह हैं, जिसके अर्थ सतह पर नहीं, गहराइयों में उतरकर ही ग्रहण किए जा सकते हैं। जिस धैर्य और संवेदना के साथ ये कविताएँ लिखी गई हैं, पाठक से भी वे उसी धैर्य और संवेदना की माँग करती हैं।…
रवींद्र वर्मा की कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं कि शहर केवल सड़कों, मकानों और भीड़ का समूह नहीं होता; वह एक जीवित शरीर होता है, जिसमें भय, प्रेम, प्रतीक्षा, हिंसा, करुणा और थरथराहट, सब कुछ स्पंदित रहता है। यह संग्रह उसी धड़कते हुए शरीर से हमारा परिचय कराता है।
—नरेश सक्सेना




